लक्ष्मी का सुख
जया और लक्ष्मी दोनों का बचपन एक ही साथ गुजरा था, दोनों में बहुत गहरी दोस्ती थी । दोनों को एक दुसरे को देखे बिना चैन नहीं मिलता था । समय पंख लगा कर उड़ रहा था । दोनों ने जवानी की दहलीज़ पर कदम रखा तो घरवालो को शादी की चिंता सताने लगी, लेकिन दोनों ने अपने घरवालो को साफ़ कह दिया था कि वे शादी करेगी तो एक ही शहर में ताकि रोज़ एक दूसरे से मिल सके, किस्मत ने साथ दिया दोनों की शादी एक ही शहर में अच्छे घरो में हो गयी ।
दोनों बहुत ही खुश थी अपनी अपनी गृहस्थी में लेकिन, नियति को कुछ और ही मंजूर था । एक कार एक्सीडेंट में लक्ष्मी के पति और सास ससुर चल बसे । लक्ष्मी पर तो दुखो का पहाड़ टूट पड़ा, उसके कोई संतान भी नहीं थी जिसके सहारे वो जीना चाहे ।
वह पूरी तरह टूट चुकी थी, लेकिन जया ने ऐसे दुःख के समय उसका पूरा साथ दिया और उसे अपनी दोस्ती का वास्ता देकर जीवित रहने पर मजबूर किया । जया रोज़ अपने घर के काम निबटा कर उसके पास आ जाती और उसका दिल बहल जाता किन्तु यह ज्यादा दिन नहीं चल सका क्योंकि जया की भी गृहस्थी थी, बाल बच्चों में व्यस्त होने के बाद वह लक्ष्मी के लिए समय नहीं निकाल सकी ।
लक्ष्मी फिर से अकेली हो गयी और घर की जमा पूंजी भी ख़त्म हो गयी । जया ने लक्ष्मी से कहा कि तुम मेरे घर आकर हमारे साथ ही रहो, लेकिन स्वाभिमानी लक्ष्मी को यह मंजूर ना था । उसने जया से कहा की ठीक है तुम मुझे कोई काम दे दो तब तो मैं तुम्हारे घर आ जाया करुँगी । जया उसे अच्छी तरह जानती थी की वह मुफ्त में मुझसे कुछ नहीं लेगी इसलिए उसने मन मार घर का छोटा मोटा काम लक्ष्मी को बता दिया ।उसे ये संतोष था की चलो इस बहाने ही सही यह कुछ समय तो मेरे साथ रहेगी, लक्ष्मी रोज़ सुबह अपने घर से जया के घर आती, काम करती, दोनों कुछ देर बाते करती और शाम को वह वापस अपने घर चली जाती ।
धीरे धीरे समय गुजरता गया क्योंकि लक्ष्मी थोड़ा काम करती थी इसलिए पैसे भी कम ही लेती थी, जिससे उससे गुजारा नहीं चल पाता था, बहुत बार जया ने उसे कुछ पैसे देने चाहे लेकिन उसने नहीं लिए । जया ने उसकी मदद करने का एक उपाय सोचा ।
लक्ष्मी एक छोटी पगडण्डी से उसके घर आया करती थी । जया ने एक दिन एक बैग में कुछ पैसे रखे और उसे उसी रास्ते में, जब लक्ष्मी आने वाली थी तब बैग रख दिया और खुद पेड़ के पीछे छिप गयी । लक्ष्मी घर से निकली किन्तु कहते है ना ईश्वर की इच्छा के बिना कुछ नहीं हो सकता, उसी समय लक्ष्मी के मन में विचार आया की अब मेरी उमर हो गयी है, कल को मुझे दिखना बंद हो जायेगा तो में जया के घर कैसे जा पाऊँगी । मैं क्यों ना उस समय के लिए अभी से तैयार रहूँ, ऐसा सोचकर उसने अपनी आँखे बंद की और धीरे धीरे आगे बढती रही । रोज़ आती जाती थी इसलिए उसे कुछ ज्यादा परेशानी नहीं हुई । वह आँखे बंद करके ही चलती रही और पैसो का बैग उसे दिखाई नहीं दिया । वह आगे बढ़ गई, यह देखकर जया ने अपना सिर पकड़ लिया कि, मैं कितनी ही कोशिश कर लूँ, लक्ष्मी की किस्मत में लक्ष्मी का सुख है ही नहीं है ।
किसी ने सच ही कहा है कि वक्त से पहले और नसीब से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता है ।
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